देहाती कामुक रोमांस · 3 episodes · 12:39 · Jul 24
अंधेरी रातों का पहला स्पर्श और प्यार का जन्म : भाग 1
dehati kamukh romance
Episode 1
Shanaya
दोस्तों, आज की कहानी है अंधेरी रातों के पहले स्पर्श और प्यार के जन्म की। ये कहानी है राजस्थान के एक छोटे से गाँव की, जहाँ एक अंधी लडकी दुर्गा रहती थी, जिसकी उँग
दोस्तों, आज की कहानी है अंधेरी रातों के पहले स्पर्श और प्यार के जन्म की। ये कहानी है राजस्थान के एक छोटे से गाँव की, जहाँ एक अंधी लडकी दुर्गा रहती थी, जिसकी उँगलियाँ किसी का भी चेहरा छूकर उसकी हर रेखा को याद कर लेती थीं। एक दिन उसकी मुलाकात रोहित से होती है, और फिर शुरू होता है एक ऐसा सफर जहाँ स्पर्श ही भाषा बन जाता है। तो चलिए, शुरू करते हैं ये कहानी...
दोस्तों, आज की कहानी है राजस्थान के एक छोटे से गाँव की, जहाँ रहती थी दुर्गा - एक अंधी लडकी, उम्र 22 साल। दुर्गा का शरीर ऐसा था मानो किसी मूर्तिकार ने अपनी पूरी कला लगा दी हो - लंबे काले बाल, गोरा चेहरा, भरे हुए गुलाबी होंठ, बडे-बडे स्तन, पतली कमर, मोटे नितंब, और मजबूत जांघें। उसके हाथों का स्पर्श जादुई था - किसी का भी चेहरा छूकर वह उसकी हर रेखा, हर उभार, हर नरमी और हर खुरदरापन को समझ जाती थी। वह मिट्टी से मूर्तियाँ बनाती थी, और उसकी उँगलियाँ किसी का चेहरा छूकर उसकी हर बनावट को याद रख लेती थीं।
एक दिन दुर्गा बाजार से लौट रही थी, उसकी लाल चुनरी हवा में लहरा रही थी, और उसके कुर्ते के नीचे उसके बडे स्तन चलते-चलते हिल रहे थे। तभी गाँव का गुंडा राणा - एक दाढी-मूंछ वाला दबंग, जिसकी आँखें लाल रहती थीं और जिसका इरादा गाँव की हर सुंदर लडकी पर बुरा होता था - उसके सामने आ खडा हुआ। राणा ने दुर्गा का हाथ पकडा, उसे खींचने की कोशिश की, "अरे अंधी रानी, इधर आओ, मुझसे मिलना तो बाकी है।"
दुर्गा डरी हुई थी, उसके हाथ काँप रहे थे, वह चीखने वाली ही थी कि तभी एक जोरदार आवाज़ गूँजी - "हाथ हटा उससे, साला!" राणा पीछे मुडा, तो सामने खडा था रोहित - 28 साल का एक जवान मर्द, 5 फुट 10 इंच, शरीर ऐसा मानो किसी ने उसे मेहनत की भट्टी में ढाला हो। उसकी बाजूएँ मोटी और मजबूत थीं, छाती चौडी और बालों से ढकी हुई, पेट पर छह पैक मांसपेशियाँ उभरी हुई थीं, और उसकी लुंगी के नीचे एक उभार था जो हर हरकत पर हिलता रहता था। रोहित ने राणा को एक जोरदार धक्का दिया, "भाग जा यहाँ से!" राणा हार गया, भाग गया। रोहित ने दुर्गा का हाथ पकडा और धीरे-धीरे सहलाते हुए कहा, "डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती बढी। रोहित रोज़ दुर्गा के घर आता, उसे बाजार ले जाता, गाने सुनाता। एक दिन बारिश हो रही थी, आसमान में बिजली चमक रही थी, और झोपडी की छत पर पानी की बूँदें गिर रही थीं। दुर्गा ने रोहित को अंदर बुलाया। अंदर अंधेरा था, सिर्फ बिजली की चमक से चेहरे दिखते थे। दुर्गा ने कहा, "मुझे तुम्हारा चेहरा छूना है... मैं तुम्हारी मूर्ति बनाना चाहती हूँ।" रोहित उसके करीब आया। दुर्गा के हाथ ने पहले उसके गालों को छुआ - दाढी का हल्का सा खुरदरापन, फिर होंठ - गीले और गर्म, फिर गर्दन - जहाँ उसकी नब्ज तेज़ी से धडक रही थी। उसकी उँगलियाँ रोहित की छाती पर उतरीं तो उसके दिल की धडकन महसूस की। दुर्गा के शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड गई, उसके नीचे नमी होने लगी।
रोहित ने उसकी कमर पकडी, और धीरे-धीरे उसे पास खींचा। उसके स्तन रोहित की छाती से रगड खाने लगे, दुर्गा के निप्पल कडे हो गए। रोहित ने अपने होंठ दुर्गा के होठों पर रखे - पहले हल्का सा, फिर गहरा। उसकी जीभ दुर्गा के मुँह के अंदर गई और दोनों की जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं। दुर्गा ने पहली बार किसी का चुंबन महसूस किया था - गीला, गर्म, और पूरी तरह से उसे पिघला देने वाला। रोहित का हाथ धीरे-धीरे उसके कुर्ते के नीचे गया। उसने उसकी चिकनी कमर को सहलाया और फिर ऊपर... उसके भारी, मुलायम स्तनों पर आ गया। दुर्गा कराह उठी - यह स्पर्श उसे पागल कर रहा था। रोहित ने उसके कुर्ते को ऊपर किया, ब्लाउस को नीचे खींचा, और उसके स्तन बाहर आ गए - बडे, गोल, और उन पर गहरे गुलाबी निप्पल कडे खडे थे। रोहित ने एक निप्पल को अपने मुँह में लिया और चूसने लगा, दुर्गा की कराह और तेज़ हो गई।
रोहित ने दुर्गा को बिस्तर पर लिटाया। बाहर बारिश की तेज़ बूँदें झोपडी की छत पर गिर रही थीं, अंदर सिर्फ उनके शरीरों की आवाज़ें गूँज रही थीं। रोहित ने अपनी बनियान उतारी - उसकी छाती पर बाल थे, पेट पर मांसपेशियाँ उभरी हुई थीं, और उसकी लुंगी नीचे एक उभार दिखाई दे रहा था जो पहले ही पूरी तरह तैयार हो चुका था। दुर्गा ने अपना हाथ बढाकर रोहित के शरीर को छुआ - उसकी छाती के बाल, उसका मजबूत पेट, और फिर नीचे। जब उसका हाथ लुंगी के अंदर गया, तो उसे रोहित का लंड मिला - सीधा, मोटा, और बहुत गर्म। उसके हाथ ने उसे गोल-गोल घुमाया, उसका हाथ पूरी तरह उसे समेट नहीं पा रहा था। उसके हाथ में आने पर रोहित गहरी साँस लेने लगा, उसका लंड और कठोर हो गया।
रोहित ने दुर्गा की साडी और पेटीकोट को नीचे किया। वह पूरी तरह नग्न थी - उसके सफेद, चिकने शरीर पर बारिश की बूँदें पड रही थीं। उसकी जांघें खुली हुई थीं और बीच में एक काली, घनी वनस्पति थी, जो उसके रस से पूरी तरह भीग चुकी थी। रोहित ने अपना सिर उसके पैरों के बीच रखा, और अपनी जीभ से उसकी चूत को चाटना शुरू किया। दुर्गा चीखी - "नहीं... रुको... वहाँ नहीं..." लेकिन उसके शरीर ने विरोध नहीं किया। रोहित की जीभ फटी हुई भिंडी की तरह उसकी चूत के अंदर-बाहर जा रही थी। उसकी जीभ ने उसकी चूत की पत्तियों को चीरा, उसका रस चूसा, और फिर उसकी चूत के अंदर गहराई तक गई। दुर्गा ने रोहित के बालों को पकड लिया, उसकी जांघें काँप रही थीं, उसके स्तन उछल-उछल कर गिर रहे थे।
"और... और गहरा... रोहित..." दुर्गा की आवाज़ काँप रही थी। रोहित ने अपनी जीभ और अंदर डाली, और अपनी उँगलियों से उसकी चूत को रगडना शुरू कर दिया। दुर्गा की चूत से लगातार रस बह रहा था, रोहित ने उसे पूरा पी लिया। जब उसकी उँगलियों ने उसकी चूत की अंदरूनी दीवारों को छुआ, तो दुर्गा कराह उठी - "आ रहा है... मैं आ रही हूँ..." उसकी चूत में ऐंठन शुरू हो गई, उसका पूरा शरीर तन गया, और फिर वह चरम पर पहुँच गई। उसकी चूत से रस की एक और बौछार निकली, जिसे रोहित ने बडे चाव से पी लिया।
"अब मेरी बारी है," रोहित ने कहा और उसने लुंगी पूरी तरह उतार दी। उसका लंड लाल सिरे वाला, नसों से भरा हुआ, और पूरी तरह कडा खडा था। उसने दुर्गा को पलटकर उसके नितंबों पर हाथ रखा, जो मोटे और गोल थे। दुर्गा ने घुटनों के बल अपनी स्थिति बनाई, उसका चेहरा बिस्तर पर था और नितंब हवा में ऊँचे उठे हुए थे। रोहित ने अपने हाथों से उसके नितंबों को फैलाया, अपनी उँगली उसकी चूत के अंदर डाली, और फिर अपने लंड को उसके रस से गीला किया। उसने अपना लंड दुर्गा की चूत पर रखा, पहले बाहर से रगडा, और फिर धीरे-धीरे अंदर डालना शुरू किया। दुर्गा की चूत बहुत तंग थी, रोहित का मोटा लंड मुश्किल से अंदर जा रहा था, लेकिन दुर्गा के रस ने उसे गीला कर दिया। एक-एक इंच अंदर जाने पर दुर्गा कराह रही थी, उसके नितंब काँप रहे थे।
जब पूरा लंड अंदर गया, तो रोहित ने एक गहरी साँस ली और धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। "तुम बहुत तंग हो, दुर्गा," उसने गुर्राते हुए कहा, "और बहुत गर्म।" दुर्गा का रस उसके लंड को पूरी तरह भिगो चुका था, रोहित की गति तेज़ होती जा रही थी। उसकी जांघें दुर्गा के नितंबों से टकरा रही थीं, और कमरे में थप-थप की आवाज़ गूँज रही थी। दुर्गा के स्तन बिस्तर पर रगड खा रहे थे, और वह बार-बार चिल्ला रही थी - "और... और तेज़... मुझे मत रोको..." रोहित ने उसकी कमर को जोर से पकडा, और अब तेज़ धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ दुर्गा की चूत उसके लंड को और गहराई से दबोचती जा रही थी। दोनों के शरीर पसीने से भीग गए थे, उनके शरीर एक-दूसरे से चिपक गए थे।
अचानक दुर्गा चिल्लाई - "रुको... रुको... मैं फिर आ रही हूँ..." रोहित ने और तेज़ गति से धक्के मारे, दुर्गा का शरीर ऐंठ गया, उसकी चूत ने रोहित के लंड को कसकर पकड लिया, और ठीक उसी पल रोहित ने भी स्खलित किया। उसका गर्म, गाढा वीर्य दुर्गा की चूत के अंदर गहराई तक भर गया। दोनों कुछ देर उसी स्थिति में रहे, साँसें भारी थीं, शरीर काँप रहे थे। रोहित ने धीरे-धीरे अपना लंड बाहर निकाला, उस पर दुर्गा के रस और अपने वीर्य का मिश्रण था। दुर्गा मुँह के बल बिस्तर पर गिर पडी, उसके नितंबों पर रोहित के हाथ के निशान थे और उसकी चूत से वीर्य बाहर बह रहा था, उसकी जांघों पर बहता हुआ गिर रहा था।
रोहित ने उसे अपनी बाहों में भरा और कहा - "मैं तुमसे शादी करूंगा, दुर्गा। मैं तुम्हारी आँखें ठीक करवाऊँगा, ताकि तुम मुझे देख सको।" दुर्गा ने मुस्कुराते हुए कहा, "और मैं तुम्हारी मूर्ति बनाऊँगी, जब मैं देख सकूँगी।"
तो दोस्तों, ये था हमारी कहानी का पहला भाग। दुर्गा और रोहित का प्यार तो गहरा हो गया, रोहित ने शादी और आँखों के ऑपरेशन का वादा कर दिया। लेकिन क्या यह प्यार इतना आसान रहेगा? क्या आसमान में इन दोनों के लिए कुछ और लिखा है? आपने देखा कैसे उनके जिस्म एक हुए, कैसे चूत और लंड का मिलन हुआ – लेकिन क्या यह सब बस एक रात की बात थी?
आगे के भाग में जानिए – रोहित क्या गाँव जाकर वापस आ पाता है? क्या दुर्गा को उसकी आँखें मिल पाती हैं? या फिर कोई नया मोड़ आता है? तो बने रहिए हमारे साथ, क्योंकि आने वाला भाग और भी दिलचस्प, और भी कामुक होने वाला है। अगले भाग में मिलेंगे – तब तक अपना ख्याल रखें और हाँ, कहानी को दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करें!
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