बाप बेटी की चुदाई · 18:26 · Jul 25
बाप बेटी की चुदाई
father daughter
Shanaya
दोस्तों, आज की कहानी है एक ऐसे रिश्ते की जो परिवार की चारदीवारी में छिपा, पर दिलों की गहराइयों में उतर गया। यह कहानी है आरती और उसके ससुर श्रीकांत की, जहाँ अकेल
दोस्तों, मेरा नाम अंजुरा है। आज की कहानी है एक ऐसे रिश्ते की जो परिवार की चारदीवारी में छिपा, पर दिलों की गहराइयों में उतर गया। यह कहानी है आरती और उसके ससुर श्रीकांत की, जहाँ अकेलापन और वासना एक ऐसा मोड ले आते हैं जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। तो चलिए, शुरू करते हैं इस अनकहे सफर को।
मेरा नाम आरती है। मेरी शादी को चार साल हो चुके थे। मेरे पति का नाम सूरज है और हम एक संयुक्त परिवार में रहते थे। मेरे ससुर का नाम श्रीकांत है – वह 52 साल के एक फिट और स्मार्ट आदमी हैं। ससुर ने कभी भी बुढापा महसूस नहीं किया था। उनकी आँखों में वही चमक थी, उनके कंधे उतने ही चौडे थे, और उनके शरीर पर जो मेहनत के निशान थे, वे उन्हें और भी आकर्षक बनाते थे। सूरज अक्सर बिजनेस ट्रिप पर चला जाता था। वह महीने में 15-20 दिन शहर से बाहर रहता था। मैं और मेरी सास – सुधा जी – घर संभालती थीं। पर पिछले एक साल से सुधा जी अपनी बीमारी के कारण अपने मायके में रह रही थीं। इसलिए घर में अब सिर्फ मैं और मेरे ससुर जी थे।
शुरू-शुरू में सब सामान्य था। मैं सुबह जल्दी उठती, चाय बनाती, ससुर जी को देती, फिर नाश्ता, दोपहर का खाना, शाम की चाय – सब कुछ रुटीन में चलता था। पर धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि ससुर जी की नज़रें मुझ पर ठहरने लगी थीं। पहले तो मैंने सोचा कि शायद मुझे भ्रम हो रहा है, पर जल्द ही मुझे समझ आ गया कि वह मुझे एक औरत की नज़र से देखने लगे थे। एक दिन मैंने रसोई में काम करते हुए हल्का सा कुर्ता पहना था। नीचे मैंने सिर्फ पेटीकोट पहन रखा था। गर्मी इतनी थी कि कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैं झुक कर बर्तन निकाल रही थी कि अचानक मुझे लगा कि कोई मेरी पीठ पर खडा है। जब मैंने पीछे मुडकर देखा तो ससुर जी खडे थे, उनकी नज़र मेरी कमर पर थी, जहाँ मेरा कुर्ता थोडा ऊपर चढ गया था और मेरी जांघ का कुछ हिस्सा दिख रहा था। उन्होंने तुरंत अपनी नज़रें हटाईं और बोले, "बहू, चाय बना दो।" मैंने कहा, "जी ससुर जी।" पर उस दिन के बाद से मुझे उनकी नज़रों में एक अलग ही तीव्रता महसूस होने लगी। वह जब भी मुझसे बात करते, तो मेरी आँखों में देखते, फिर धीरे-धीरे मेरे बदन पर नज़र दौडाते। मैं भीतर से घबराने लगी थी, पर मेरे शरीर में कुछ और ही हो रहा था – एक ऐसी उत्तेजना जिसे मैं समझा नहीं पा रही थी।
एक रात करीब 11 बजे थे। ससुर जी अक्सर देर तक जागते थे और बालकनी में बैठकर किताब पढते थे। मैं भी सो नहीं पा रही थी। मैंने सोचा कि चाय बना कर लाऊँ। जब मैं चाय लेकर बालकनी में गई, तो ससुर जी नीची कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने सिर्फ एक बनियान और निक्कर पहन रखी थी। उनके शरीर पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं और उनकी छाती पर बालों की हल्की परत थी। मैंने उन्हें ऐसे पहले कभी नहीं देखा था। मैंने चाय उनके सामने रखी और बोली, "ससुर जी, चाय।" उन्होंने चाय ली, पर उनकी उँगलियाँ मेरे हाथ को छू गईं। वह छूत बिजली की तरह पूरे शरीर में दौड गई। मैं वहीं खडी रह गई। उन्होंने धीरे से मेरा हाथ पकडा और बोले, "बहू, क्या तुम्हें कभी अकेलापन महसूस होता है?" मैंने कुछ जवाब नहीं दिया, बस सिर झुका लिया। उन्होंने मेरा हाथ छोडा और मुझे जाने का इशारा किया। मैं कमरे में आ गई, पर उस रात मैं सो नहीं पाई। मेरे दिमाग में बार-बार वह छूत, वह आवाज़, वह नज़र – सब कुछ घूम रहा था।
तीन दिन बाद मानसून की पहली बारिश हुई। पूरा दिन झमाझम बारिश होती रही। शाम तक बिजली भी चली गई। मैं और ससुर जी घर में अकेले थे। मोमबत्तियाँ जलाईं, पर पूरे घर में एक अजीब सी रोशनी थी – उस नमी और अंधेरे का मेल कुछ और ही कर रहा था। मैंने हल्का सा नाइटी पहन रखा था जो घुटनों तक आता था। बारिश की नमी से मेरे बाल बिखरे हुए थे और मेरे शरीर पर हल्की सी चमक थी। ससुर जी ने मुझे बुलाया, "आरती, थोडी चाय बना दो, ठंड लग रही है।" मैं चाय लेकर लिविंग रूम में आई। सोफे पर बैठकर वह मुझे घूर रहे थे। आज उनकी आँखों में कुछ और ही था – एक ऐसी प्यास जो चाय से नहीं बुझने वाली थी। मैंने चाय रखी और बैठने ही वाली थी कि उन्होंने मेरा हाथ पकडकर खींचा और मैं उनके करीब आ गई।
"ससुर जी, यह क्या..." मैंने हकलाकर कहा। "चुप रहो आरती," उन्होंने कहा, "तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कितने दिनों से देख रहा हूँ। तुम्हारे बिना मेरा मन नहीं लगता। तुम्हारा बदन, तुम्हारी चाल, तुम्हारी आँखें – सब कुछ मुझे पागल कर रहा है।" मैं काँप रही थी, पर मुझमें उन्हें रोकने की ताकत नहीं थी। क्योंकि भीतर कहीं मैं भी यह चाहती थी – एक ऐसा हाथ जो मुझे प्यार दे, एक ऐसा शरीर जो मुझे अपनी बाँहों में भींच ले। और वह मेरे सामने थे। उन्होंने मेरी ठुड्डी पकडी और मेरे होठों पर अपने होंठ रख दिए। वह पहला चुम्बन था – भारी, गर्म, और अनजाना। मैंने उन्हें रोका नहीं। मेरे होठों ने जवाब दिया। मेरी जीभ ने उनकी जीभ को ढूँढा और हम दोनों पागलों की तरह चूमने लगे। उनका एक हाथ मेरी कमर पर था और दूसरा धीरे-धीरे मेरी जाँघ पर सरकने लगा। मैं काँप उठी, पर मुझे मजा आ रहा था। उन्होंने मुझे सोफे पर लिटा दिया और मेरे नाइटी को ऊपर सरका दिया। मेरे शरीर पर सिर्फ एक पैंटी थी।
उन्होंने मेरी जाँघों को चूमना शुरू किया, धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढते हुए। मेरी साँसें तेज़ हो गईं। जब उनके होंठ मेरी पैंटी के किनारे पर पहुँचे, तो मैंने उनके बाल पकड लिए। उन्होंने पैंटी को किनारे किया और सीधे मेरी चूत पर अपने होंठ रख दिए। "आह... ससुर जी...!" मैं चीखी। उन्होंने मेरी चूत को ऐसे चाटा जैसे कोई भूखा इंसान खाना खाता है। उनकी जीभ मेरी फाँकों में घुस रही थी, मेरे दाने को छू रही थी, मुझे पागल कर रही थी। मैं अपना सिर पीछे झुकाकर कराह रही थी। मेरी चूत से पानी निकलने लगा और वह सब कुछ पी गए। "आरती, तुम्हारा रस अमृत है," उन्होंने कहा।
फिर उन्होंने अपनी निक्कर उतारी। मैंने उनका लंड देखा – मोटा, लंबा, कडक। मेरे पति का लंड कभी इतना बडा नहीं था। मेरा मुँह खुला रह गया। उन्होंने मेरा हाथ पकडा और अपने लंड पर रखा। मैंने उसे सहलाया, जोर से पकडा, मसला – उनकी आँखें बंद हो गईं। "मुँह में लो," उन्होंने कहा। मैंने घुटनों के बल बैठकर उनका लंड मुँह में लिया। मैंने उसे पहले ऊपर-नीचे किया, फिर गहरा लिया, जितना हो सके। उनके हाथ मेरे बालों में थे और वह धीरे-धीरे मेरे मुँह को चोद रहे थे। मेरे मुँह से थूक बह रहा था, पर मुझे बहुत मज़ा आ रहा था। "बस, अब बहुत हो गया। लेट जाओ," उन्होंने हुक्म दिया। मैंने सोफे पर अपनी पीठ के बल लेट गई। उन्होंने मेरी टाँगें खोलीं और अपने लंड को मेरी चूत के दरवाजे पर टिकाया। मेरी चूत गीली थी, तैयार थी, और मचल रही थी। उन्होंने एक जोर का धक्का दिया और उनका पूरा लंड मेरे अंदर चला गया। "आह... ससुर जी... बहुत बडा है!" मैं चिल्लाई। "चुप रहो, मजा लो," उन्होंने कहा और लगातार धक्के मारने शुरू कर दिए।
हर धक्के के साथ मैं और अकड रही थी। मेरा शरीर उनकी लय में ढल गया। मैं उनकी पीठ पर हाथ फेर रही थी, उन्हें करीब खींच रही थी, अपनी टाँगें उनकी कमर पर लपेट रही थी। वह पसीने से तर थे, पर रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। "बहू, तुम्हारी चूत जन्नत है," उन्होंने कहा। "ससुर जी, और तेज़, और!" मैंने पागलों की तरह कहा। उन्होंने मुझे उठाया और मेरी गांड पकडकर मुझे अपने लंड पर उछालना शुरू किया। मैं उनकी गर्दन पर हाथ डाले झूल रही थी, और उनका लंड मेरी चूत में आ जा रहा था। उस रात ससुर ने मुझे कई पोजीशन में चोदा – डॉगी स्टाइल, मिशनरी, साइड, ऊपर-नीचे। मैंने कई बार झडी। और जब वह झडे तो उन्होंने अपना सारा वीर्य मेरी चूत में भर दिया।
सुबह जब मैं उठी, तो मुझे लगा कि यह सब कोई सपना था। पर जब मैंने ससुर जी को रसोई में देखा, तो वह मुस्कुराए और बोले, "आज अच्छी चाय बनाना।" मैंने शरमाकर सिर झुका लिया। उन्होंने मेरे पास आकर मेरी कमर पर हाथ रखा और बोले, "यह हमारा राज़ है। और हम इसे जारी रखेंगे।" उस दिन के बाद, हमारे बीच जो रिश्ता था, वह पूरी तरह बदल गया। अब जब भी मौका मिलता, हम छिपकर मिलते। कभी ससुर जी मुझे बालकनी में बुलाते, तो कभी मैं उनके कमरे में चली जाती। हमने होटल, कार, किचन, बाथरूम – जहाँ भी मौका मिला, खूब चुदाई की।
एक रात मैं किचन में पानी पीने गई। मैंने सिर्फ एक पतला नाइटगाउन पहना था। ससुर जी भी पानी पीने आए। उन्होंने मुझे पीछे से पकडा, मेरी गर्दन पर चूमा और बोले, "आज नहीं मानूंगा।" "ससुर जी, यहाँ कोई आ सकता है," मैंने कहा। "रात को कौन आएगा?" उन्होंने कहा और मेरे गाउन को ऊपर कर दिया। मैंने आगे झुककर किचन के प्लेटफार्म पर हाथ रखे। उन्होंने मेरी पैंटी नीचे की और बिना वक्त बर्बाद किए अपना लंड मेरी चूत में डाल दिया। मेरी चूत पहले से गीली थी। उन्होंने तेज़-तेज़ धक्के मारे और मैं अपने होंठ दबाकर चीख रही थी। "ससुर जी... और गहरा..." मैं बडबडाई। उन्होंने मेरे बालों को पकडा और एक हाथ से मेरी गांड पर थप्पड मारा। उस थप्पड से मुझे और मज़ा आया। मैं और जोर से गांड हिलाने लगी। उन्होंने 10 मिनट तक किचन में ही मुझे झाडा। फिर उन्होंने मुझे घुमाया, मुझे प्लेटफार्म पर बिठाया, और मुँह में लंड डाल दिया। मैंने उनका लंड चूसा, चाटा, गटकने की कोशिश की। उन्होंने मेरे मुँह में स्खलित किया और मैंने सब पी लिया। वह पिघला हुआ स्वाद मुझे अब पसंद आने लगा था।
तीन दिन बाद ससुर जी ने मुझसे कहा, "आरती, अब गांड दो।" मैं थोडी घबरा गई। मेरी गांड अभी तक कुंवारी थी। किसी ने भी मुझे वहाँ छुआ तक नहीं था – न मेरे पति ने, न किसी और ने। पर ससुर जी की बात माननी थी। वह तो मेरे मालिक थे अब। उन्होंने मुझे बेड पर चित लिटाया, मेरे नीचे तकिया रखा, और मेरी गांड पर तेल लगाया। फिर उन्होंने उँगली डाली – धीरे-धीरे, गोल-गोल, अंदर-बाहर। "आह... थोडा दर्द है," मैंने कहा। "आराम करो, जल्दी अच्छा लगेगा," उन्होंने कहा और एक उँगली के बाद दो उँगलियाँ डालीं। फिर उन्होंने अपने लंड को तेल से चिकना किया और मेरी गांड पर रखा। धीरे-धीरे उन्होंने अंदर पेलना शुरू किया। "आह..." मेरे मुँह से दर्द और आनन्द का मिश्रित निकला। "बहुत टाइट है, मज़ा आ रहा है," उन्होंने कहा और आगे बढते रहे। पूरा लंड अंदर जाने के बाद मैं साँस रोक रही थी। दर्द था, पर उस दर्द में कुछ और था – एक गहरी तृप्ति। उन्होंने धीरे-धीरे अपना लंड बाहर निकाला और फिर अंदर डाला। धीरे-धीरे गति बढी। "ससुर जी... और तेज़!" मैं चीखी। उन्होंने मेरी गांड को तेजी से चोदा। मेरे बूब्स हिल रहे थे, मेरा मुँह खुला था, मैंने अपनी उँगलियाँ बिस्तर पर गडा दी थीं। मैं पागल हो रही थी। उन्होंने मेरी गांड से अपना लंड निकाला और मेरे मुँह में डाला – मुझे अपने ही गांड की बू आई, जिसने मुझे और उत्तेजित कर दिया। मैंने उनका लंड चूसा, वह साफ किया और फिर उन्होंने मुझे घोडी बनाकर पीछे से गांड और चूत दोनों में बारी-बारी से चोदा। उस रात मेरी गांड का उद्घाटन हुआ और मैंने पहली बार गांड में भी वीर्य महसूस किया।
एक बार मेरी सास – यानी सुधा जी – दो दिन के लिए घर आ गईं। वह पूरी तरह बीमार थीं, पर फिर भी आईं। उनके आने से हम दोनों परेशान हो गए, पर हमारी भूख बुझी नहीं थी। एक दिन जब सुधा जी बाथरूम में नहा रही थीं, तो ससुर जी ने मुझे उनके कमरे में बुलाया। मैं डर रही थी, पर वह बोले, "डरो मत, वह अभी बाहर नहीं आएगी।" उन्होंने मुझे दरवाजे के पास लिटाया और मेरी चूत चोदना शुरू किया। मैंने अपने मुँह पर हाथ रखा था, पर मेरी सिसकारियाँ फिर भी सुनाई दे रही थीं। जब सुधा जी बाहर आईं, हमने अलग होने का नाटक किया। मेरे चेहरे पर पसीना था, मेरी साँसें तेज़ थीं। मैं कमरे में आ गई। पर उसी रात जब सब सो गए, ससुर जी फिर से मेरे कमरे में आए और मुझे चुपचाप 2 घंटे तक चोदते रहे।
समय बीतता रहा। मैंने महसूस किया कि अब मुझे ससुर जी के बिना नींद नहीं आती। उनके स्पर्श के बिना मेरा शरीर बेचैन हो जाता था। और वह भी मुझसे अलग नहीं रह सकते थे। एक दिन मैंने उनसे कहा, "ससुर जी, अगर सबको पता चल गया तो?" उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भींचा और बोले, "तब हम सबको सच बता देंगे। मुझे परवाह नहीं है।" मैं समझ गई कि अब हमारा रिश्ता सिर्फ शारीरिक नहीं रहा था – यह कुछ और था। एक गहरा लगाव, एक प्यार, जो शायद गलत था, पर बहुत सच्चा था।
एक दिन मेरे पति सूरज ने कहा कि वह अब स्थायी रूप से शहर में ही रहेंगे, ट्रांसफर रद्द हो गया है। यह सुनकर मैं और ससुर जी दोनों टूट गए – पर अलग-अलग कारणों से। मेरे लिए यह मौका था अपने रिश्ते को खत्म करने का। पर ससुर जी ने आखिरी रात मुझसे कहा – "एक बार और, फिर कभी नहीं।" उस रात मैंने अपने आप को पूरी तरह उनके हवाले कर दिया। मैंने उन्हें कपडे पहनने भी नहीं दिए। मैंने उनके शरीर को चूमा, चाटा, चूसा। मैंने उन्हें कभी इतनी बार नहीं चोदा था जितनी बार उस रात चोदा – डॉगी, मिशनरी, राइडिंग, स्टैंडिंग, साइड, 69, सब कुछ। उन्होंने मेरी चूत, मेरी गांड, मेरा मुँह – तीनों में अपना वीर्य भर दिया। मैंने अपने शरीर के हर छेद को उन्हें दिया। वह भी रुके नहीं। सुबह होने से पहले हम दोनों ने खुद को संभाला।
अगले दिन सूरज आ गया। सब सामान्य हो गया। पर ससुर जी और मैं – हमने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुराए। हम जानते थे कि यह एक अनकहा वादा है। और शायद जब कभी मौका मिलेगा, हम फिर से एक होंगे। क्योंकि वासना – जब भी जागती है, मरती नहीं, सिर्फ सो जाती है।
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