भाई-बहन · 18:35 · Jul 31
बहन के साथ चूत चुदाई का मजा-1
Bahan Ke Sath Chut Chudai Ka Maza- Part 1
Aahir
दोस्तों, आज की कहानी है एक ऐसे भाई की, जिसके मन में अपनी ही बहन के लिए ऐसी भावनाएँ जाग उठीं, जिनका नाम सुनकर ही शरीर में गर्माहट आ जाती है। अमित और उसकी दीदी सं
दोस्तों, आज की कहानी है एक ऐसे भाई की, जिसके मन में अपनी ही बहन के लिए ऐसी भावनाएँ जाग उठीं, जिनका नाम सुनकर ही शरीर में गर्माहट आ जाती है। अमित और उसकी दीदी संगीता की ये कहानी है, जो एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं और जहाँ हर पल की नज़दीकी एक नई आग में बदल जाती है। कैसे अमित की नज़रें अपनी दीदी पर टिकने लगती हैं और कैसे एक दिन उसकी हिम्मत बढ जाती है, ये सब जानने के लिए बने रहिए। तो चलिए, शुरू करते हैं…
मेरा नाम अमित है और मैं 21 साल का एक युवक हूँ.
मेरी दीदी का नाम संगीता है। उसकी उम्र करीब 26 साल है। दीदी मुझसे 5 साल बडी हैं।
हम लोग एक मध्यम वर्ग परिवार से हैं और एक छोटे से फ्लैट में मुंबई में रहते हैं।
पिताजी और माँ दोनों नौकरी करते हैं।
हमारे घर में एक छोटा सा हॉल, डायनिंग रूम दो बेडरूम और एक किचन है।
बाथरूम एक ही था और उसको सभी लोग इस्तेमाल करते थे।
दीदी मुझको अमित कह कर पुकारती हैं और मैं उनको दीदी कह कर पुकारता हूँ।
शुरू शुरू में मुझे सेक्स के बारे कुछ नहीं मालूम था, मैं कॉलेज में पढता था और हमारे बिल्डिंग में भी अच्छी मेरे उम्र की कोई लडकी नहीं थी। इसलिए मैंने अभी तक सेक्स का मजा नहीं लिया था और ना ही मैंने अब तक कोई नंगी लडकी देखी थी।
हाँ मैं कभी कभी पॉर्न मैगजीन में नंगी तस्वीरें देख लिया करता था।
जब मुझे लडकियों की तरफ और सेक्स के लिए रूचि होना शुरू हुई तो मेरी नज़रों के आसपास अगर कोई लडकी थी तो वो संगीता दीदी ही थीं।
दीदी की लंबाई क़रीब क़रीब मेरे तरह ही थी, उनका रंग बहुत गोरा था और उनका चेहरा और शारीरिक बनावट हिंदी सिनेमा के जीनत अमान जैसा था।
हाँ उनकी चूचियाँ जीनत अमान जैसे बडी बडी नहीं थी।
मुझे अभी तक याद है कि मैंने अपना पहला मुठ मेरी दीदी के लिए ही मारा था।
एक रविवार सुबह सुबह जैसे ही मेरी दीदी बाथरूम से निकलीं, मैं बाथरूम में घुस गया।
मैंने बाथरूम का दरवाजा बंद किया और अपने कपडे खोलने शुरू किए।
मुझे जोरों की पेशाब लगी थी।
पेशाब करने के बाद मैं अपने लंड से खेलने लगा।
एकाएक मेरी नजर बाथरूम के किनारे दीदी के उतरे हुए कपडों पर पडी।
वहाँ पर दीदी अपनी नाइटगाऊन उतार कर छोड गई थीं।
जैसे ही मैंने दीदी का नाइटगाऊन उठाया तो देखा की नाइटगाऊन के नीचे दीदी की ब्रा पडी थी।
मैंने दीदी की काले रंग की ब्रा उठाई तो मेरा लंड अपने आप खडा होने लगा। मैंने दीदी का नाइटगाऊन उठाया तो उसमें से दीदी के नीले रंग का पैंटी भी नीचे गिर गई। मैंने पैंटी भी उठा ली।
अब मेरे एक हाथ में दीदी की पैंटी थी और दूसरे हाथ में दीदी की ब्रा थी।
ओह भगवान! दीदी के अन्दर वाले कपडे चूमने से ही कितना मजा आ रहा है … यह वही ब्रा है जिसमें कुछ देर पहले दीदी की चूचियाँ जकडी हुई थी और यह वही पैंटी है जो कुछ देर पहले तक दीदी की चूत से लिपटी थी।
यह सोच सोच करके मैं हैरान हो रहा था और अंदर ही अंदर गरमा रहा था।
मैं सोच नहीं पा रहा था कि मैं दीदी की ब्रा और पैंटी को लेकर क्या करूँ।
मैंने दीदी की ब्रा और पेंटी को लेकर हर तरफ़ से छूआ, सूंघा, चाटा और पता नहीं क्या क्या किया। मैंने उन कपडों को अपने लंड पर मला, ब्रा को अपनी छाती पर रखा।
मैंने अपने खडे लंड के ऊपर दीदी की पैंटी को पहना और वो लंड के ऊपर तनी हुई थी।
फिर बाद में मैं दीदी की नाइटगाऊन को बाथरूम के दीवार के पास एक हैंगर पर टांग दिया।
फिर कपडे टांगने वाला पिन लेकर ब्रा को नाइटगाऊन के ऊपरी भाग में फँसा दिया और पेंटी को नाइटगाऊन के कमर के पास फँसा दिया।
अब ऐसा लग रहा था कि दीदी बाथरूम में दीवार के सहारे ख़डी हैं और मुझे अपनी ब्रा और पेंटी दिखा रही हैं।
मैं झट से जाकर दीदी के नाइटगाऊन से चिपक गया और उनकी ब्रा को चूसने लगा और मन ही मन सोचने लगा कि मैं दीदी की चूची चूस रहा हूँ।
मैं अपने लंड को दीदी की पेंटी पर रगडने लगा और सोचने लगा कि मैं दीदी को चोद रहा हूँ।
मैं इतना गरम हो गया था कि मेरा लंड फूल कर पूरा का पूरा टनटना गया था और थोडी देर के बाद मेरे लंड ने पानी छोड दिया और मैं झड गया।
मेरे लंड ने पहली बार अपना पानी छोडा था और मेरे पानी से दीदी की पैंटी और नाइटगाऊन भीग गया था।
मुझे पता नहीं कि मेरे लंड ने कितना वीर्य निकाला था लेकिन जो कुछ निकला था वो मेरे दीदी के नाम पर निकला था।
मेरा पहले पहले बार झडना इतना तेज था कि मेरे पैर जवाब दे गए, मैं पैरों पर ख़डा नहीं हो पा रहा था और मैं चुपचाप बाथरूम के फ़र्श पर बैठ गया।
थोडी देर के बाद मुझे होश आया तो मैं उठ कर नहाने लगा।
शॉवर के नीचे नहा कर मुझे कुछ ताजगी महसूस हुई और मैं फ़्रेश हो गया।
नहाने के बाद मैं दीवार से दीदी की नाइटगाऊन, ब्रा और पैंटी उतारा और उसमें से अपना वीर्य धोकर साफ़ किया और नीचे रख दिया।
उस दिन के बाद से मेरा यह मुठ मारने का तरीका मेरा सबसे पसंदीदा हो गया।
हाँ, मुझे इस तरह से मुठ मारने का मौका सिर्फ इतवार को ही मिलता था क्योंकि इतवार के दिन ही मैं दीदी के नहाने के बाद नहाता था।
इतवार के दिन चुपचाप अपने बिस्तर पर पडा देखा करता था कि कब दीदी बाथरूम में घुसे और दीदी के बाथरूम में घुसते ही मैं उठ जाया करता था और जब दीदी बाथरूम से निकलती तो मैं बाथरूम में घुस जाया करता था।
मेरे माँ और पिताजी सुबह सुबह उठ जाया करते थे और जब मैं उठता था तो माँ रसोई में नाश्ता बनाती होतीं और पिताजी बाहर बालकनी में बैठ कर अखबार पढते होते या बाज़ार गए होते कुछ ना कुछ समान ख़रीदने।
इतवार को छोड कर मैं जब भी मुठ मारता तो तब यही सोचता कि मैं अपना लंड दीदी की रस भरी चूत में पेल रहा हूँ।
शुरू शुरू में मैं यह सोचता था कि दीदी जब नंगी होंगी तो कैसी दिखेंगी?
फिर मैं यह सोचने लगा कि दीदी की चूत चोदने में कैसा लगेगा।
मैं कभी कभी सपने में दीदी को नंगी करके चोदता था और जब मेरी आँखें खुलती तो मेरा शॉर्ट भीगा हुआ होता था।
मैंने कभी भी अपनी सोच और अपने सपने के बारे में किसी को भी नहीं बताया था और न ही दीदी को भी इसके बारे में जानने दिया।
मैं अपनी स्कूल की पढाई खत्म करके कालेज जाने लगा।
कॉलेज में मेरी कुछ गर्लफ्रेंड भी हो गई।
उन गर्लफ्रेंड में से मैंने दो चार के साथ सेक्स का भी मजा लिया।
मैं जब कोई गर्लफ्रेंड के साथ चुदाई करता तो मैं उसको अपने दीदी के साथ तुलना करता और मुझे कोई भी गर्लफ्रेंड दीदी के बराबर नहीं लगती!
मैं बार बार यह कोशिश करता था कि मेरा दिमाग दीदी पर से हट जाए.
लेकिन मेरा दिमाग घूम फिर कर दीदी पर ही आ जाता।
मैं हमेशा 24 घंटे दीदी के बारे में और उसको चोदने के बारे में ही सोचता रहता।
जब भी मैं घर पर होता तो दीदी को ही देखता रहता.
लेकिन इसकी जानकारी दीदी को नहीं थीं।
दीदी जब भी अपने कपडे बदलती थीं या माँ के साथ घर के काम में हाथ बटाती तो मैं चुपके चुपके उन्हें देखा करता था और कभी कभी मुझे उनकी सुडौल चूची देखने को मिल जाती (ब्लाउज़ के ऊपर से) थी।
दीदी के साथ अपने छोटे से घर में रहने से मुझे कभी कभी बहुत फायदा हुआ करता था।
कभी मेरा हाथ उनके शरीर से टकरा जाता था।
मैं दीदी के दो भरे भरे चूची और गोल गोल चूतडों को छूने के लिए मरा जा रहा था।
मेरा सबसे अच्छा टाइम पास था अपने बालकोनी में खडे हो कर सडक पर देखना, और जब दीदी पास होती तो धीरे धीरे उनकी चूचियों को छूना।
हमारे घर की बालकोनी कुछ ऐसी थी कि उसकी लम्बाई घर के सामने गली के बराबर में थी और उसकी संकरी सी चौडाई के सहारे खडे हो कर हम सडक देख सकते थे।
मैं जब भी बालकोनी पर खडे होकर सडक को देखता तो अपने हाथों को अपने सीने पर मोड कर बालकोनी की रेलिंग के सहारे ख़डा रहता था।
कभी कभी दीदी आती तो मैं थोडा हट कर दीदी के लिए जगह बना देता और दीदी आकर अपने बगल ख़डी हो जाती।
मैं ऐसे घूम कर ख़डा होता कि दीदी को बिलकुल सट कर खडा होना पडता।
दीदी की भरी भरी चूची मेरे सीने से सट जाता था।
मेरे हाथों की उंगलियाँ, जो कि बालकोनी के रेलिंग के सहारे रहती वे दीदी की चूचियों से छू जाती थी।
मैं अपने उंगलियों को धीरे धीरे दीदी की चूचियों पर हल्के हल्के चलाता था और दीदी को यह बात नहीं मालूम थी। मैं उँगलियों से दीदी की चूची को छू कर देखा कि उनकी चूची कितनी नरम और मुलायम है लेकिन फिर भी तनी तनी रहा करती है कभी कभी मैं दीदी के चूतडों को भी धीरे धीरे अपने हाथों से छूता था।
मैं हमेशा ही दीदी की सेक्सी शरीर को इसी तरह से छूता था।
मैं समझता था कि दीदी मेरे हरकतों और मेरे इरादों से अनजान हैं दीदी को इस बात का पता भी नहीं था कि उनका छोटा भाई उनके नंगे शरीर को चाहता है और उनकी नंगी शरीर से खेलना चाहता है लेकिन मैं ग़लत था।
फिर एक दिन दीदी ने मुझे पकड लिया।
उस दिन दीदी किचन में जा कर अपने कपडे बदल रही थीं। हॉल और किचन के बीच का पर्दा थोडा खुला हुआ था।
दीदी दूसरी तरफ़ देख रही थीं और अपनी कुर्ती उतार रही थीं और उनकी ब्रा में छूपी हुई चूची मेरे नज़रों के सामने था।
फ़िर रोज़ की तरह मैं टी वी देख रहा था और दीदी को भी कनखियों से देख रहा था।
दीदी ने तब एकाएक सामने वाले दीवार पर टंगे शीशे को देखा और मुझे आँखें फ़िरा फ़िरा कर घूरते हुए पाया। दीदी ने देखा कि मैं उनकी चूचियों को घूर रहा हूँ। फिर एकाएक मेरे और दीदी की आँखे शीशे में टकरा गई मैं शर्मा गया और अपनी आँखें टी वी की तरफ़ कर ली।
मेरा दिल क्या धडक रहा था।
मैं समझ गया कि दीदी जान गई हैं कि मैं उनकी चूचियों को घूर रहा था।
अब दीदी क्या करेंगी?
क्या दीदी माँ और पिताजी को बता देंगी? क्या दीदी मुझसे नाराज़ होंगी?
इसी तरह से हज़ारों प्रश्न मेरे दिमाग़ में घूम रहे थे।
मैं दीदी की तरफ़ फिर से देखने का साहस जुटा नहीं पाया।
उस दिन सारा दिन और उसके बाद 2-3 दिनों तक मैं दीदी से दूर रहा, उनके तरफ़ नहीं देखा।
इन 2-3 दिनों में कुछ नहीं हुआ।
मैं ख़ुश हो गया और दीदी को फिर से घूरना चालू कर दिया।
दीदी ने मुझे 2-3 बार फिर घूरते हुए पकड लिया लेकिन फिर भी कुछ नहीं बोलीं।
मैं समझ गया कि दीदी को मालूम हो चुका है कि मैं क्या चाहता हूँ!
ख़ैर जब तक दीदी को कोई एतराज़ नहीं तो मुझे क्या लेना देना और मैं मज़े से दीदी को घूरने लगा।
एक दिन मैं और दीदी अपने घर के बालकोनी में पहले जैसे खडे थे।
दीदी मेरे हाथों से सट कर ख़डी थीं और मैं अपने उँगलियों को दीदी के चूची पर हल्के हल्के चला रहा था।
मुझे लगा कि दीदी को शायद यह बात नहीं मालूम कि मैं उनकी चूचियों पर अपनी उँगलियों को चला रहा हूँ।
मुझे इसलिए लगा क्योंकि दीदी मुझसे फिर भी सट कर ख़डी थीं।
लेकिन मैं यह तो समझ रहा था क्योंकि दीदी ने पहले भी नहीं टोका था, तो अब भी कुछ नहीं बोलेंगी और मैं आराम से दीदी की चूचियों को छू सकता हूँ।
हम लोग अपने बालकोनी में खडे थे और आपस में बातें कर रहे थे, हम लोग कॉलेज और स्पोर्ट्स के बारे में बातें कर रहे थे। हमारे बालकोनी से सामने एक गली थी तो हम लोगों की बालकोनी में कुछ अंधेरा था।
बातें करते करते दीदी मेरे उँगलियों को, जो उनकी चूची पर घूम रहा था, अपने हाथों से पकड कर अपनी चूची से हटा दिया। दीदी को अपनी चूची पर मेरे उंगली का एहसास हो गया था और वो थोडी देर के लिए बातें करना बंद कर दीं और उनकी शरीर कुछ अकड गईं लेकिन, दीदी अपने जगह से हिलीं नहीं और मेरे हाथों से सट कर खडी रहीं।
दीदी ने मुझसे कुछ नहीं बोलीं तो मेरी हिम्मत बढ गई और मैंने अपना पूरा का पूरा पंजा दीदी की एक मुलायम और गोल गोल चूची पर रख दिया।
मैं बहुत डर रहा था। पता नहीं दीदी क्या बोलेंगी? मेरा पूरा का पूरा शरीर काँप रहा था। लेकिन दीदी कुछ नहीं बोलीं। दीदी सिर्फ़ एक बार मुझे देखीं और फिर सडक पर देखने लगीं। मैं भी दीदी की तरफ़ डर के मारे नहीं देख रहा था।
मैं भी सडक पर देख रहा था और अपने हाथ से दीदी की एक चूची को धीरे धीरे सहला रहा था। मैं पहले धीरे धीरे दीदी की एक चूची को सहला रहा था और फिर थोडी देर के बाद दीदी की एक मुलायम गोल गोल, नरम लेकिन तनी चूची को अपने हाथों से ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा। दीदी की चूची काफ़ी बडी थी और मेरे पंजों में नहीं समा रही थी।
थोडी देर बाद मुझे दीदी की कुर्ती और ब्रा के उपर से लगा की चूची के निप्पल तन गईं और मैं समझ गया कि मेरे चूची मसलने से दीदी गरमा गईं हैं दीदी की कुर्ती और ब्रा के कपडे बहुत ही महीन और मुलायम थी और उसके ऊपर से मुझे दीदी की निप्पल तनने के बाद दीदी की चूची छूने से मुझे जैसे स्वर्ग मिल गया था।
किसी जवान लडकी के चूची छूने का मेरा यह पहला अवसर था। मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब तक दीदी की चूचियों को मसलता रहा। और दीदी ने भी मुझे एक बार के लिए मना नहीं किया। दीदी चुपचाप ख़डी हो कर मुझसे अपनी चूची मसलवाती रही।
दीदी की चूची मसलते मसलते मेरा लंड धीरे धीरे ख़डा होने लगा था। मुझे बहुत मजा आ रहा था लेकिन एकाएक माँ की आवाज़ सुनाई दी। माँ की आवाज़ सुनते ही दीदी ने धीरे से मेरा हाथ अपने चूची से हटा दिया और माँ के पास चली गईं उस रात मैं सो नहीं पाया, मैं सारी रात दीदी की मुलायम मुलायम चूची के बारे में सोचता रहा।
दूसरे दिन शाम को मैं रोज़ की तरह अपने बालकोनी में खडा था। थोडी देर के बाद दीदी बालकोनी में आईं और मेरे बगल में ख़डी हो गईं मैं 2-3 मिनट तक चुपचाप ख़डा दीदी की तरफ़ देखता रहा।
दीदी ने मेरे तरफ़ देखीं। मैं धीरे से मुस्कुरा दिया, लेकिन दीदी नहीं मुस्कुराईं और चुपचाप सडक पर देखने लगीं।
मैं दीदी से धीरे से बोला- छूना है.
मैं साफ़ साफ़ दीदी से कुछ नहीं कह पा रहा था।
और पास आ दीदी ने पूछा- क्या छूना चाहते हो?
साफ़ साफ़ दीदी ने फिर मुझसे पूछीं।
तब मैं धीरे से दीदी से बोला- तुम्हारी दूध छूना!
दीदी ने तब मुझसे तपाक से बोलीं- क्या छूना है साफ़ साफ़ बोलो?
मैं तब दीदी से मुस्कुरा कर बोला- तुम्हारी चूची छूना है उसको मसलना है।
“अभी माँ आ सकती है.” दीदी तब मुस्कुरा कर बोलीं।
मैं भी तब मुस्कुरा कर अपनी दीदी से बोला- जब माँ आएगी तो हमें पता चल जायेगा।
मेरे बातों को सुन कर दीदी कुछ नहीं बोलीं और चुपचाप नज़दीक आ कर ख़डी हो गईं, लेकिन उनकी चूची कल की तरह मेरे हाथों से नहीं छू रहे थे।
मैं समझ गया कि दीदी आज मेरे से सट कर ख़डी होने से कुछ शर्मा रही हैं अबतक दीदी अनजाने में मुझसे सट कर ख़डी होती थीं। लेकिन आज जानबूझ कर मुझसे सट कर ख़डी होने से वो शर्मा रही हैं क्योंकि आज दीदी को मालूम था की सट कर ख़डी होने से क्या होगा।
जैसे दीदी पास आ गईं और अपने हाथों से दीदी को और पास खींच लिया। अब दीदी की चूची मेरे हाथों को कल की तरह छू रही थी। मैंने अपना हाथ दीदी की चूची पर टिका दिया।
दीदी के चूची छूने के साथ ही मैं मानो स्वर्ग पर पहुँच गया। मैं दीदी की चूची को पहले धीरे धीरे छुआ, फिर उन्हें कस कस कर मसला। कल की तरह, आज भी दीदी की कुर्ती और उसके नीचे ब्रा बहुत महीन कपडे की थी,
और उस में से मुझे दीदी की निप्पल तन कर खडे होना मालूम चल रहा था। मैं तब अपने एक उंगली और अंगूठे से दीदी की निप्पल को ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा।
मैं जितनी बार दीदी की निप्पलों को दबा रहा था, उतनी बार दीदी कसमसा रही थीं और दीदी की मुँह शरम के मारे लाल हो रही थी। तब दीदी ने मुझसे धीरे से बोलीं- धीरे दबा, तब मैं लगता धीरे धीरे करने।
मैं और दीदी ऐसे ही फालतू बातें कर रहे थें और देखने वाले को यही दिखता कि मैं और दीदी कुछ गंभीर बातों पर बहस कर रहे थें। लेकिन असल में मैं दीदी की चूचियों को अपने हाथों से कभी धीरे धीरे और कभी ज़ोर ज़ोर से मसल रहा था।
थोडी देर बाद माँ ने दीदी को बुला लिया और दीदी चली गईं ऐसे ही 2-3 दिन तक चलता रहा।
मैं रोज़ दीदी की सिर्फ़ एक चूची को मसल पाता था। लेकिन असल में मैं दीदी की दोनों चूचियों को अपने दोनो हाथों से पकड कर मसलना चाहता था। लेकिन बालकोनी में खडे हो कर यह मुमकिन नहीं था। मैं दो दिन तक इसके बारे में सोचता रहा।
एक दिन शाम को मैं हॉल में बैठ कर टी वी देख रहा था। माँ और दीदी किचन में डिनर की तैयारी कर रही थीं। कुछ देर के बाद दीदी काम ख़त्म करके हॉल में आ कर बिस्तर पर बैठ गईं, दीदी ने थोडी देर त
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